"डर तो हमेशा रहेगा," आशा ने कहा, "पर डर ही तो रंग नहीं चुनता—हिम्मत चुनती है।"
"क्या तुम फिर से वही चुप्पी चुनोगे?" आशा ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब सवाल नहीं, चुनौती थी। वह मुठ्ठी बँधाए खड़ा था, और पल भर के लिए समय थम गया।
आशा ने गहरी सांस ली। आँसुओं की तरह हल्की, पर फिर भी वक्त के नक्शे पर कुछ गैहराई छोड़ती हुई। उसने अपनी पुरानी साड़ी का किनारा थाम लिया—वो साड़ी जिसकी हर सिलाई में बीती गलियों की यादें बुनी हुई थीं। "मुझे रंग दो," उसने खुद से कहा, "पर इस बार ऐसे रंग जो धुंध से नहीं, सच्चाई से चलें।"